शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

पार्लियामेंट तो बांझ और बेसवा है - महात्मा गांधी

गांधी जी की पुस्तक हिन्द स्वराज के कुछ अंश

पाठक: आप जो कहते हैं उस पर से तो मैं यही अंदाजा लगाता हूं कि इंग्लैंड में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है।
संपादक: आपका यह खयाल सही है। इंग्लैड में आज जो हालत है वह सचमुच दयनीय तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही मांगता हूं कि हिन्दुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं वह पार्लियामेन्ट तो बांझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कडे हैं तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक उस पार्लियामेन्ट ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर जोर दबाव डालनेवाला कोई न हो तो वह कुछ भी न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है। और वह बेसवा है क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पास वह रहती है। आज उसका मालिक एस्क्विथ है तो कल बालफर होगा और परसों कोई तीसरा।

अगर पार्लियामेन्ट बांझ न हो तो इस तरह होना चाहिये- लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेम्बर चुनकर भेजते हैं। मेम्बर तनख्वाह नहीं लेते इसलिए उन्हें लोगों की भलाई के लिए पार्लियामेन्ट में जाना चाहिये। लोग खुद सुशिक्षित संस्कारी माने जाते हैं इसलिए उनसे भूल नहीं होती। ऐसा हमें मानना चाहिये ऐसी पार्लियामेन्ट को अर्जी की जरूरत नहीं होनी चाहिये। न दबाव की। उस पार्लियामेन्ट का काम इतना सरल होना चाहिये कि दिन ब दिन उसका तेज बढ़ता जाय और लोगों पर उसका असर होता जाय। लेकिन इससे उलटे इतना तो सब कबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं।
सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेन्ट कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियामेन्ट ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बडे सवालों की चर्चा जब पार्लियामेन्ट में चलती है तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते हैं। उस पार्लियामेन्ट में मेम्बर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं।

जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं वैसे ही सदा पार्लियामेन्ट के होते हैं। प्रधानमंत्री को पार्लियामेन्ट की थोड़ी ही परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। पार्लियामेन्ट सही काम कैसे करे इसका वह बहुत कम विचार करता है। अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री पार्लियामेन्ट से कैसे कैसे काम करवाता है इसकी मिसालें जितनी चाहिये उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है।

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हिन्द स्वराज में कही गई बातें इंग्लैंड की संसद के लिए थीं। किन्तु आज यदि हम देखें कि ये बातें भारत की संसद के लिए भी लागू हो जाती हैं।
हिन्द स्वराज पूरी डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें: http://www.mediafire.com/?iv23vqax6dgla7a

पाठकों को मेरा एक और सुझाव है कि वो हिन्द स्वराज पढ़ने के पश्चात श्री कनक तिवारी जी की पुस्तक "फिर से हिन्द स्वराज" भी जरूर पढ़ें। इससे हिन्द स्वराज को समझने में मदद मिलेगी।

महात्मा गांधी से संबंधित लेखों की कड़ियां
गांधी और हिंदू परम्परावादी
गांधी की अहिंसा का फलितार्थ
यह तो नहीं है गांधी का रास्ता



4 टिप्‍पणियां:

  1. गांधी जी का हिन्द स्वराज और उसे समझने हेतु कनक जी का फिरसे हिन्द स्वराज । यह आपने ठीक कहा है ।

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  2. सत्‍य वही सम्‍मानित होता है, जो संदर्भ बदलने पर भी सार्थक हो. बधाई.

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  3. गांधी की बात कोई भी नहीं मानी गयी लेकिन पुतला बैठाना जरूरी था अपनी दूकान चलाने के लिए ।

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  4. जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं वह पार्लियामेन्ट तो बांझ और बेसवा है

    sarthak lekh .ankur ji

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