सोमवार, 15 मार्च 2010

हिन्दी अखबार ही हिन्दी को डुबोने में लगे हैं

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ऊपर दिये गए सारे चित्र एक ही अखबार से हैं, हरिभूमि से। क्या आपको नही लगता कि एक हिन्दी के अखबार में अनावश्यक अंग्रेजी का प्रयोग किया गया है?

दैनिक भास्कर भी हरिभूमि की तरह हिन्दी में अंग्रेजी जमकर घुसेड़ रहा है। कल अपने दोस्त के यहां मैंने अखबार देखा लिखा था : Sunday दैनिक भास्कर।

ये वही अखबार है जो एक जमाने में लिखता था: “खुश हों कि आज रविवार है”। तो आज आपको रविवार की जगह “Sunday” क्यों लिखना पड़ रहा है?

दैनिक भास्कर की वेबसाइट देखिए:

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इसमें जमकर अंग्रेजी घुसेड़ी गई है. शहरों के नामों के साथ साथ लगभग सभी शीर्षक अंग्रेजी में लिखे गए हैं.

 

और इस कार्य में इन अखबारों का नेता बनकर उभरा है: नवभारत टाइम्स

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http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/5683610.cms

ये अखबार न तो हिन्दी लिखता है और ना ही अंग्रेजी. ये शुद्ध हिंग्लिश का प्रयोग करता है। (और हिंग्लिश का प्रयोग कोई उपलब्धि नही है बल्कि समस्या है)

ये अखबार अक्सर हिन्दी को डुबोने के लिए लोगों को जागरूक(?) करने के लिए लेख भी निकालता है।

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अब एक और चित्र देखिए। अखबार में ये सरकारी विज्ञापन आया है। इसमें लिखा है : “तम्बाखू से मुख का कर्क रोग होता है”

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मैं इसका क्या अर्थ निकालूं? क्या इसमें मेरे जैसे लोगों का मजाक उड़ाया जा रहा है कि “बहुत हिन्दी हिन्दी करते हो। अब ये लो। ऐसी हिन्दी कि किसी को आसानी से समझ में ना आये” या सरकार चाहती ही नही कि लोग ये जानें कि तम्बाखू से कैंसर होता है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम सही फरमाया आपने । एक जमाने का सर्वाधिक लोकप्रिय नवभारत टाइम्स तो मैंने मंगाना ही छोड़ दिया । पता नहीं इसने अपने अखबार में कैसे अंग्रेज़ी के पिट्ठुओं को बैठा रखा है कि हिंग्लिश की ऐसी खटार्रा खिचड़ी परोसते हैं कि कै आती है । इनको लगता है कि यह आधुनिक हैं..कुछ अखबार तो पूरे के पूरे अंग्रेज़ी का पन्ना घुसेड़ रहे हैं ।

    प्रभाष जोशी जी ने इस पर विस्तार से लिखा था तब इन तथाकथित आधुनिकतावादी खच्चरों ने उन पर तालिबानी ब्राह्मण कह कर हमला किया था ।

    सच ही है कि हिंदीवालों ने ही हिंदी को डुबोया..वर्ना क्या १५ करोड़ की अरबी,स्पेनिश हिंदी पर भारी पड़ती ।

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  2. "बहुत हिन्दी-हिन्दी करते हो ना"

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  3. जानकारी के लिए धन्यवाद। ऐसे अखबारो की एक काली सुची बनानी चाहिए। फिर ब्लाग की मदत से हिंदी के सिपाहियो के पास भेजी जाए यह जानकारी। फिर देखे कौन खरिदता है हिन्दी के दगाबाजो के अखबार। आज से नवभारत टाईम्स को मेरा भी तिरस्कार.......

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  4. हिन्दी के हत्यारे यही हैं जो हिन्दी की रोटी खाते व उसके नाम पर अपनी दुकान चमकाए बैठे हैं। प्रभु जोशी जी ने ‘नई दुनिया’ वालों के ऐसे ही भाषाभ्रष्टाचार के विरुद्ध एक अभियान चलाया था, जिसमें सफलता भी पाई थी।
    वैसे ही अभियान के साथ चला जाए तो ही इन लोगों की अकल ठिकाने आए।

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  5. सही लिखा है आपने ! वाकई ये हिंदी अख़बार हिंदी का बेडा गर्क करने में लगे है |
    यही नहीं आजकल हिंदी अख़बार वाले हिंदी ब्लोग्स से सामग्री चुराकर बिना अनुमति अपने अख़बारों में धडल्ले से छाप रहे है और छापने के बाद भी ब्लॉग लेखक को बताते तक नहीं |

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  6. आपने सही बात की है मैं आपसे सहमत हूँ ...

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  7. हर मामले में आम जनता को ही जागरूक होना पडेगा .. वरना व्‍यवसायिक सफलता या किन्‍ही अन्‍य लालच के कारण सारे हिंदी का बेडा गर्क करने में लगे हैं।

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  8. टीआरपी के चक्कर में ये सभी अपने नैतिक कर्तव्य को भुला बैठे हैं।

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  9. kya bat hai, bahut hi sahi nazar dali, achcha lapeta hai.

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  10. अंग्रेजी के अखबार सरकारी बाजार में मुंह मांगी कीमत पर बिकते हैं. इस कीमत को जुटाने के लिए इन्हें भी अंग्रेजी की बोली बोलनी पड़ेगी. लेकिन इन घुसपैठियों को मालूम नहीं है कि वो अखबार इनके खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं.

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  11. ांअपसे सहमत मगर क्या किया जा सकता है इन्हें कोसने के सिवा। धन्यवाद नव संवत्सर की शुभकामनायें

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  12. @निर्मला कपिला : मेरा उद्देश्य केवल कोसना नही है बल्कि मैं ये भी चाहता हूं कि पत्रकार बंधु तथा अखबार के बड़े अधिकारी इसे देखकर अपने अखबार में सुधार लाएं.

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  13. बेनामी18/3/10, 12:13 am

    हिंगलिश का प्रयोग करने में बुराई ही क्या है? अखबार का काम खबर देना होता है ना की लोगों को हिंदी सिखाना| अतिशुद्ध हिंदी का उपयोग आपको वाकई मजाक का पात्र बना देता है|

    एक भाषा तभी विकसित हो सकती है जब उसमे इतनी क्षमता हो की ये अपने आस पास के वातावरण के साथ सामंजस्य बिठा सके| ये हिंदी की महानता ही है की इसने कितनी ही भाषाओँ को अपने मैं समेत लिया है, फिर चाहे वो उर्दू हो या इंग्लिश या फिर भारत की अनगिनत क्षेत्रीय भाषाएँ| आप ही के ब्लॉग में आपने ना जाने कितने उर्दू शब्दों का प्रयोग कर डाला है, मसलन: अखबार, ज़माने, जमकर, घुसेड़ी आदि आदि, जो की निश्चय ही हिंदी शब्द नहीं हैं|

    मेरे विचार में ये खुशी की बात है और हिंगलिश का सफल प्रयोग एक उपलब्धि ही माना जाना चाहिए|

    ये मेरे अपने विचार हैं, आपको आघात पहुँचाने का कोई उद्देश्य नहीं है|

    एक हिंदी प्रेमी

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  14. Anonymous जी,
    http://www.facebook.com/note.php?note_id=324394391760&1&index=0

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  15. Yatendra jain20/3/10, 11:51 am

    yaar ankur kah to shahi rah ho. par kya tum inka veroodh kar ne kosis kar rahe ho kya
    aur yadi ha to jo tum T.V mein dekha rahe vo kya, jo har movie mein 'A' grad gus gaya uske liya tum kya kar rahe ho. Jo har T.V serail dekhaya ja raha uska kya, yahe lik dene se na news paper band hoga..

    if you want to contact me i'am also your city so pls mail me :- yatendrajain2007@yahoo.com

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  16. हमारे हिन्दी को काफी नुकसान पहुचा है। हिन्दी को खिचड़ी बना दिया गया है। यह सब नुकसान करने का काम हमारे शिक्षा पद्धति के कारण हुआ है आजकल माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कुलो में भर्ती किये जा रहे है.बड़ी चिन्ता की बात है..
    और हमारे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कुलों की संख्या ज्यादा है.हिन्दी को हिंग्लिश बनाने में ये स्कुल कम नही है.क्योकि बच्चा जब अंग्रेजी में लिखे वाक्यों समझने के लिए हिन्दी का सहारा लेना पढ़ता है ओर यही आगे चलकर हिंग्लिश वाक्य बन जाता है। अंग्रेजी सिधा समझ नही आता। समझने के लिए अन्य भाषा सहारा लेना पड़ता है इसलिए अंग्रेजी बेसाहरा भाषा है. अंगेजी माध्यम के बच्चे लोग विषय को समझने के बजाय रटने लगते है.... यही से बच्चों का नीव कमजोर होने लगती है... आगे चलकर बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए प्रतियोगी परीक्षा में हिन्दी माध्यम के बच्चे के मुकाबले में अंग्रेजी माध्यम के बच्चे पिछड़ जाते है... पिछड़ने के कारण विषय की समझ में कमी...... हिन्दी माध्यम बच्चे ही आई.आई.टी जैसे संस्थानों में अपना दबदबा कायम रख पाते है...क्योकि शुरु से ही समझने वाली हिन्दी भाषा में ही अध्ययन कर चुके होते थे। इसलिएर अंग्रेजी पूस्तक को पढ़ने में कोई ढिक्कत नही आती है। इसलिए हमारा राष्ट्रभाषा हिन्दी बहुत शक्तिशाली भाषा है इसका कोई दो राय नही है....हमारा प्राथमिक भाषा हिन्दी है न कि अंग्रेजी। ध्यान रहे कि शुद्ध हिन्दी के शब्दों का भी उपयोग होते रहना चाहिए।.......तभी हिन्दी का सेवा हो पायेगा...... आपका मोन्टू जी

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