शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

तो क्या हम बेवकूफ़ हैं जो भारतीय भाषाओं को आगे लाना चाहते हैं.

आज नवभारत टाइम्स में एक लेख छपा है जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं:

लेख का शीर्षक है नये भारत के लिये अंग्रेजी जरूरी

 

लेख में कहा गया है: समाज को जड़ कर देने वाली जाति संस्था को तोड़ने का दम इंग्लिश शिक्षा में ही नजर आ रहा है।

 

मैं कहता हूं जाति संस्था के दुष्प्रभाव से होता क्या है? यही ना कि एक वर्ग अपने आप को तोप समझने लगता है और दूसरे को नीचा. क्या अंग्रेजी शिक्षा से ऐसा नही होता? होता है. अंग्रेजी ज्यादा जानने वाला अंग्रेजी कम जानने वाले को गंवार मानता है. यानि कि एक नये प्रकार की जाति व्यवस्था शुरू हो जाती है एक भारतीय और एक इंडियन के बीच.

 

आगे लिखा है इंग्लिश स्कूलों में पढ़ने वालों में से आधे से कुछ कम यानी 41 फीसदी नौकरी के लिए महाराष्ट्र से बाहर चले गए। जबकि मराठी स्कूलों में पढ़ने वालों में 11 फीसदी ही राज्य के बाहर नौकरी करने गए।

 

अरे उन ४१ प्रतिशत में से बहुत तो महाराष्ट्र क्या वो तो राष्ट्र के बाहर भी चले गये होंगे.

 

ये बात सत्य है कि अंग्रेजों से ज्यादा अंग्रेजी हमें अपना गुलाम बना चुकी है. और अंग्रेजी के बिना काम नही चल पाता है.

पर क्या पूरी तरह हथियार डालना अच्छा है(जैसा नाभटा के लेख में बताया जा रहा है)

या

हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अधिक ज्ञान को उपलब्ध कराना और उसमें रोजगार उपलब्ध करवाना.

 

और हां जब मैं गुस्से में ये लेख लिख रहा हूं तब मेरे मामा मेरे बगल में खड़े हैं और अपने एक साथी से फ़ोन में बात कर रहे हैं. वो और उनका साथी दोनो ही हिंदी भाषी हैं. पर बात अंग्रेजी(टूटी फ़ूटी, बिना सही व्याकरण के) में कर रहे हैं. बाकी आप खुद ही समझ सकते हैं कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा होगा.

 

ध्यान रहे यहां केवल अंग्रेजी शिक्षा से मतलब केवल अंग्रेजी भाषा नही है.यहां अंग्रेजी शिक्षा से मतलब अंग्रेजी भाषा के साथ साथ पूरी की पूरी अंग्रेजियत से है.

 

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20 टिप्‍पणियां:

  1. भारतवासियों को गुलामी की आदत पडी हुई है .. यह कहना गलत नहीं लगता !!

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  2. हम बेवकूफ नहीं हैं; ये लोग हिन्दी समाचारपत्र का लबादा ओढ़े अंग्रेजों के दलाल हैं। इनको तर्क करते नहीं आता। इनके तर्कों में छेद नहीं, बड़े-बड़े गड्ढे होते हैं। ऐसे-ऐसे विचार रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ाने चाहिये।

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  3. सच कहा मगर हमारी सिक्षा प्रणाली को अंग्रेज ऐसी बना गये थे की अंग्रेजो के जाने के बाद भी अंग्रेजी नही गयी. जरुरत शिक्षा प्रणाली बदल ने की है.

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  4. नि:संदेह यह हमारी मानसिकता ही है जो अंग्रेजी को महिमामंडित किया जा रहा है। बात आपके मामाजी की नहीं हर उस व्यक्ति की है जो देखा देखी किसी अवधारणा को स्वयं पर ओढ़ लेता है यह मान कर कि जमाने के साथ चलना है, कहीं पिछड़ा हुया न कहलाऊँ। कहा जाए तो स्टेट्स सिंबल।

    अंग्रेजी के ध्वजवाहक कहते हैं कि अंग्रेजी के बलबूते ही दुनिया चल रही, वही सबसे ज़्यादा प्रचलित है। ज़रा इन्हें कोई बताये कि दुनिया में अबसे अधिक प्रचलित भाषा है मडेरियन, जिसे हम-आप चीनी भाषा कहते हैं। उसके बाद है हिंदी उर्दू फिर उसके बाद है अंग्रेजी।

    पूरी सूची यहाँ देखी जा सकती है जिसमें टॉप 20 में तमाम अंतर्राष्ट्रीय भाषायों के बीच बंगाली 6वें व तेलुगु 16वें क्रम पर हैं।

    जो यह कहते हैं कि MBA, इंजीनियरिंग, डॉक्टरी की किताबें नहीं हैं हिंदी में। उन्हें प्राचीन भारतीय ग्रथों से अवगत कराया जाए जिन्हें उनकी वो तो क्या उनकी आने वाली पीढ़ियाँ नहीं पढ़ पाएँगी।

    बाज़ार चलता है अपने ग्राहकों से। आज सबसे बड़ा ग्राहक समूह है भारतीय गाँव। सामने जब पड़ेगा वास्ता इनसे तो देखेंगे इन अंग्रेजी के चाहने वालों को

    हम तो अपने सीमित संसाधनों से जितना हो सकता है, हिंदी को बढ़ावा देते ही हैं

    बी एस पाबला

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  5. सही कह रहे हैं आप - गुस्से के बावजूद!

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  6. पाबला जी ने विस्तार से महत्वपूर्ण बातें कह दी हैं । अजीब हैं लोग । क्या-क्या लिख देते हैं?

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  7. पता नही कब छोड़ेगे यह अन्ग्रेजी का पीछा,इस विषय पर मैने एक लेख भी लिखा था,पाशच्यादवाद

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  8. इसी लिये मै अखबार नही पढता हू अरे भाई जब आपका और हमारा हिन्दी बलोग समाज है तब तक किसी अखबार की जानकारी की क्या जरूरत है ।

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  9. आपका गुस्सा जायज है |

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  10. सबसे बड़े दुख और शर्म की बात है अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस करना

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  11. आजादी के इतने लम्बे अरसे बाद भी आज तक हम लोग इस अंग्रेजी मोह को त्याग नहीं पाए है....पता नहीं कब जाकर अपनी भाषा को वो सम्मान मिलेगा,जिसकी कि वो वास्तविक हकदार है!!!!!
    खैर....हम सब का सामूहिक प्रयास ही इसकी गरिमा को जीवन्त करेगा।

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  12. नाराजगी स्वभाविक है.

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  13. जो नई जाति-व्यवस्था अंग्रेजियत ने बनानी शुरू की है वह भी कम खतरनाक नही है हमारे समाज के लिये
    ..वैसे यू पी और बिहार से भी कितने ही रोजगार की तलाश मे दूसरे राज्यों मे जाते हैं..अब कितने इंग्लिश स्कूलों मे पढ़ कर जाते होंगे..आप खुद समझते हैं!!
    भाषा कोई भी बुरी या पिछड़ी हुई नही होती..हमारी मानसिकता बना देती है उसे..
    विचारोत्तेजक लेख के लिये बधाई

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  14. बिल्कुल सही बात कह रहे हैं आप। उस लेख का लेखक इतना ही अंग्रेजी प्रेमी है तो उसने अपने उस लेख को हिन्दी में क्यों लिखा? वह स्वयं तो मानसिक गुलाम है और दूसरों को भी मानसिक गुलामी निकलने नहीं देना चाहता।

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  15. क्यों न शरूआत न.टा. अपना हिन्दी अखबार बन्द कर के करे...

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  16. आप सभी का टिप्पणियों के जरिये विचार प्रगट करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद

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  17. आपसे सहमत हूं अंकुर

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  18. ਤੁਸੀਂ ਗ੍ਰੇਟ ਹੋ ਅੰਕੁਰ ਭਾ ਜੀ |

    ਧਨਵਾਦ,
    ਨੇਮ

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  19. मै भी अंकुर बात से सहमत हुँ। ऐसे अखबार को बहिष्कार कर देना चाहिए। मुझे मजबूरी में गाली देनी पड़ रही है साले कुत्ते है के ये अखबार हिन्दी को बिगाड़ने लगा हुआ है। मै हिन्दी के अपमान पर बहुत गुस्सा आता है।

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