गुरुवार, 24 जुलाई 2008

लाइनेक्स मे आया मल्टी टच

माउस के बाद अगर जी यूं आई की दुनिया मे कोई अच्छी चीज हो रही है तो वो है टच टेक्नोलाजी। माइक्रोसाफ्ट तो विन्डोज़ ७ मे टच सिस्टम लगाने मे लगी है. मैं सोच रहा था की लाइनेक्स मे ऐसा हो रहा है या नही। आज नेट पर खोजा तो मिल गया । लाइनेक्स मल्टी टच मे कई उपयोगकर्ता एक साथ कई साफ्टवेयरों मे काम कर पायेंगे। इस प्रोजेक्ट का नाम है मल्टी प्वाइंटर एक्स सर्वर
टेस्टिंग और डेवलपमेंट के लिए उबंटू फेस्टी चुना गया है.
आप भी देखिये इसका वीडियो।


अधिक जानकारी के लिए यहाँ जाएँ http://wearables.unisa.edu.au/mpx/

मंगलवार, 22 जुलाई 2008

आइये जाने क्या है न्यूक्लियर डील

"कुलबुलाहट" ब्लाग में विजय जी ने एक अंग्रेजी में फ़ार्वाडेड ई मेल प्रकाशित किया है. इस ईमेल में न्यूक्लियर डील के प्रभावों और दुष्प्रभावों का जिक्र किया गया है. मैं उसी ईमेल को हिंदी में यहां प्रकाशित कर रहा हूं

…..

ये १२३एग्रीमेंट क्या है?

ये १२३एग्रीमेंट इसलिये कहलाता है क्योंकि ये अमेरिका के एटामिक पावर एक्ट के सेक्शन १२३ के अंतर्गत आता है.

चलिये देखें कि किस प्रकार इस करार के द्वारा भारत(भारतीयों) की स्वतंत्रता गिरवी रख दी जायेगी.

) इस करार के बाद अमेरिका भारत को परमाणु ऊर्जी बनाने के लिये पूरी मशीनरी, ईधन और तकनीक देगा.

) भारत २२ परमाणु ऊर्जा केंद्रों में कितनी ऊर्जा का उत्पादन होता है?कितना कहां सप्लाई होता है? क्या रिसर्च की जाती है? आदि सब कुछ गुप्त रखा जाता है. पर इस करार के बाद भारत को ये सारी जानकारी दुनिया के सामने खोलनी पडे़गी. इसके अलावा भारत के १४ प्लांट अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा संगठन के निगाहों के नीचे आ जायेंगे.

) जो इंधन इन प्लांटों में बनेगा/रिसाइकिल किया जायेगा वो सीधे IAPO के अनुसार करना होगा.

यदि भारत न्यूक्लियर टेस्ट करता है तो ये करार खत्म हो जायेगा.

) अमेरिका पूरी मशीनरी, टेक्नोलाजी आदि सब कुछ वापस ले लेगा.

)लेकिन वो १४ प्लांट लगातार स्कैन किये जाते रहेंगे.

दूसरी तरफ़ अगर अमेरिका इनका उल्लंघन करता है तब भी ये करार बना रहेगा. यानि अमेरिका चाहे तो भारत को चांटे मार सकता है और भारत ये भी पूछ नही सकता कि उसे क्यों मारा गया.

भारत अमेरिका को करार तोड़ने पर कुछ भी नही कर सकता है.

ये है वो कैप्सूल जिसे आसानी से पढ़ा और पचाया जा सकता है:

ऊर्जा की आवश्यकता

आने वाले समय में भारत के विकास के लिये सबसे बड़ी जरूरत ऊर्जा होगी. इस करार में यही दलील दी गई है कि हमें ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिये परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में बढो़त्तरी करनी पडे़गी.

भारत के ऊर्जा उत्पादन के संबंध में ये रहे आकड़े:

तापीय ऊर्जा: ६६%

जल ऊर्जा: २६%

सौर तथा पवन ऊर्जा : %

वर्तमान में ६०० करोड़ रुपये खर्च किये गये इस के उत्पादन में

परमाणु ऊर्जा: %

अगर इसे ३ से ६ % तक बढ़ाने की कोशिश की जाये तो ५०,००० करोड़ रुपये और लगेंगे.

सामान्य सी बात है कि ये निर्णय लेना ज्यादा अच्छा होगा कि अन्य ३ ऊर्जा उत्पादन के तरीकों को बढ़ाया जाये ना कि महंगा और खतरनाक परमाणु ऊर्जा को.

यूरेनियम

हमें यूरेनियम दूसरे देशों से आयात करना पड़ता है. पोखरन परीक्षण के बाद वो मिलना बंद हो गया. अमेरिका के साथ इस करार को करने पर हमें अमेरिका से यूरेनियम तो मिलने लगेगा पर हमें ये भी बताना होगा कि किस पावर प्लांट से हम माल लेकर परमाणु बम बना रहे हैं

हम ये गुप्त जानकारी उन्हे क्यों बतायें? क्या किसी बाहरी व्यक्ति को ये मानीटर करने की आप अनुमति देते हैं कि आपके घर के हाल और रसोई में क्या हो रहा है?

अन्य अध्ययनों से ये पता लगा है कि भारत में यूरेनियम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. दिक्कत केवल जमीन के अधिग्रहण की है.

अगले ४० सालों में परमाणु ऊर्जा और बम बनाने के लिये 25,000 MT यूरेनियम की जरूरत होगी.

जबकि भारत में ये ७५,००० MT उपलब्ध हो.

प्लूटोनियम

वर्तमान में ३५% प्लूटोनियम परमाणु बम बनाने के लिये उपयोग किया जाता है. इस करार के बाद हमें केवल १०% की ही इजाजत रहेगी. वो होते कौन हैं हमें हमारी नेचुरल रिसार्सेज का उपयोग करने से रोकते हैं. ये तो उसी तरह हुआ कि आप १० डलियों को बना और खा सकते हैं पर आपको ३ की ही इजाजत है. ऐसा कैसे हो सकता है. और हम इसे स्वीकार कैसे कर सकते हैं.

थोरियम

जैसा कि डा. एपीजे अब्दुल कलाम के द्वारा बताया गया कि हमारे पास पर्याप्त मात्रा में थोरियम है. हम तो थोरियम के दुनिया के दूसरे सबसे बडे़ उत्पादक हैं. भारत को और ऊर्जा उत्पादन के लिये आगे खोज करनी होगी. आपकी जानकारी के लिए, दक्षिण भारत विशेष तौर पर कन्याकुमारी में थोरियम खूब उपलब्द्ध है.

भारत ईरान चीन

अमेरिका भारत-ईरान और भारत-चीन की नजदीकियां नही चाहता. क्योंकि अगर भारत-चीन के रिश्ते मजबूत होंगे तो दोनो ग्लोब के पूर्वी हिस्से में राज करने लगेंगे जिसे अमेरिका फ़ूट डालो शासन करो की नीति से खत्म करना चाहता है.

इस एग्रीमेंट को साइन करने से अमेरिका चाहता है कि भारत ऊर्जा उत्पादन में उसपर निर्भर हो जाये. ईरान से भारत के बीच गैस पाइप लाइन की भी बात चल रही है. जिसे अमेरिका पसंद नही करता है.

परमाणु ऊर्जा तकनीक.

चाहे ऊर्जा बनाई जाये या चाहे बम बनाया जाये. रेडियेशन को रोका नही जा सकता है. और तो और इसके कचरे को भी स्टोर करना महंगा और असुरक्षित है.

एक बार USA के Three Miles Island में दुर्घटना घटी थी. इस प्लांट को बंद करने में २०० करोड़ डालर खर्च हुये फ़िर भी ये पूरी तरह से बंद नही हुआ.

इसी तरह एक दूसरी घटना सोवियत यूनियन के सर्बिया प्लांट में भी घटी. यहां तक की अगली पीढ़ी के बच्चे भी रेडियशन से मुक्त नही हुये है.

किसी एटामिक पावर प्लांट को बंद करना उसे बनाने से कहीं ज्यादा महंगा होता है.

फ़्रांस

फ़्रांस के पास ५६ न्यूक्लियर पावर स्टेशन हैं जो कि देश की ७३% ऊर्जा की जरूरत को पूरा करते हैं. जैसे जैसे उत्पादन बढ़ रहा है वैसे वैसे उन्हे भी परमाणु कचरे और रेडियेशन से समस्या होने लगी है. वहां की सरकार अब ऊर्जा के उत्पादन को घटाने के बारे में सोच रही है.

निष्कर्ष

ऊपर दिये गये खतरों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि करार करने और भारत को अमेरिका के हाथों सौपने के बजाय सौर और पवन ऊर्जा, और विशेष तौर पर जल ऊर्जा को बढ़ाने की जरूरत है. और ये नदियों को जोड़ने और बांध बनाने के द्वारा किया जा सकता है.

ये करार सन२००५ में शुरू हुआ था जब मनमोहन सिंह अमेरिका गये थे. दो सालों में इस करार को करने के निर्णय ने राजनैतिक मोड़ ले लिया. ना ही इस सरकार नें नाही दूसरी सरकारों ने संविधान में संशोधन करके नदियों का राष्ट्रीयकरण नही कर सकी जिससे जल स्रोतों का पूरी तरह से उपयोग हो सके और उसका प्रयोग कृषि अथवा जल ऊर्जा के कार्यों में किया जा सके.

जब कोई जरूरतमंद की मदत करता है तो आप दोनो के बीच किसी तरह की समान शर्तों की आशा नही कर सकते हैं. पर

) मदत करने वाले की मंशाओं को दिमाग लगाकर देखना चाहिये क्योंकि वो आपके पीछे कब्र खोग सकता है.

) अपने संसाधनो को बेहतर तरीके से उपयोग करना और आत्मनिर्भर बनना बेहतर रहेगा.

भारत - चीन - अमेरिका

भारत संस्कृति, धर्म और शिक्षा के स्तर में सम्पन्न है।

चीन भी इसी तरह संस्कृति, धर्म और शिक्षा में सम्पन्न है.

अमेरिका की कोई संस्कृति नही है. वो केवल दूसरों पर अपनी ताकत दिखाना चाहता है. विशेष रूप से दक्षिण एशिया में. यूरोपियन देशों के यूरो को याद रखें और ये डालर से मजबूत है. अत: उनकी दाल यूरोप में नही गल रही है और वो भारत और पाकिस्तान में प्रयास कर रहे हैं.


रविवार, 20 जुलाई 2008

कौन सी साइट किस टेक्नोलाजी का प्रयोग कर रही है? जाने builtwith से

अक्सर ऐसा होता है कि हम ये जानना चाहते हैं कि कोई वेबसाइट किस टेक्नोलाजी का प्रयोग कर रही है. builtwith.com ऐसी ही सेवा दे रहा है. बस साइट का यूआरएल टाइप कीजिये और देखिये कि टेक्नोलाजी के मामले में साइट कितनी अच्छी है.

मैने अपनी साइट का नाम टाइप किया तो उसे मिली ५ में से ४ स्टार रेटिंग. मैं खूब खुश हुआ.  ये देखिये :

image

हालांकि बेसिक आप्टीमाइजेशन रिपोर्ट में ३ स्टार मिले हैं.  जिसे मैं ठीक कर लूंगा.

आप भी एक बार चेक कीजिये: http://www.builtwith.com

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

लाइनेक्स में CHM को PDF में बदलना

उबंटू लाइनेक्स में CHM फ़ाइलों को PDF में बदलने के लिये आपको chm2pdf नाम का पैकेज इंस्टाल करना होगा.
इसे इंस्टाल करने के लिये टर्मिनल में ये कमांड दें:
sudo apt-get install chm2pdf
chm2pdf कंमांड का सिंटेक्स कुछ ऐसा होता है
/usr/bin/chm2pdf [options] input_filename [output_filename]
इंस्टालेशन होने के बाद ये कमांड टर्मिनल में दें:
chm2pdf –-book yourfile.chm
यहां पर yourfile.chm आपकी सीएचएम फ़ाइल का नाम होगा.