शनिवार, 28 जुलाई 2007

मेरी पसंदीदा कवितायेँ - 2

"मैंने ज़िन्दगी से चवन्नी का सौदा किया,
और ज़िन्दगी ने मुझे इससे ज्यादा नही दिया,
हालांकि जब शाम को मैंने अपनी मजदूरी गिनी
तो मैंने और ज्यादा पैसे मांगे।
"ज़िन्दगी एक न्यायप्रिय मालिक है,
यह आपको उतना ही देती है जितना आप माँगते हैं,
परंतु एक बार आप अपनी मजदूरी तय कर लेते हैं,
तो फिर आपको उतने पर ही काम करना पड़ता है।

"मैं एक मजदूर की पगार पर काम करता रहा,
मैंने यही सीखा, और सोचकर निराश हुआ
कि मैं ज़िन्दगी से जो भी तनख्वाह मांगता
जिन्दगी मुझे ख़ुशी ख़ुशी वही दे देती।"


स्रोत : सोचिये और अमीर बनिए (नेपोलियन हिल)

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